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Editorials - The following is an Editorial Reflecting the Views of the US Government
भूटान के शरणार्थियों का विभिन्न देशों में पुनर्वास
06/02/2008

Buddhists enjoy a break at Punakhadzong<br />
Buddhists enjoy a break at Punakhadzong
पश्चिमी नेपाल के दमक में इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर माइग्रेशन के शरणार्थी प्रोसेसिंग सेंटर के खुलने से एक लाख से अधिक भूटानी शरणार्थियों के लिए आशा की किरण जगी है । इनमें से अधिकतर करीब दो दशकों से शिविरों में रह रहे हैं । अमेरिका ने इनमें से करीब 60,000 शरणार्थियों को अमेरिका में बसने देने की पेशकश की है ।

नेपाल में अमेरिका की राजदूत नैन्सी पॉवेल, नेपाल में कोर ग्रुप ऑफ नेशन्स की चेयरमेन हैं । इस समूह में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, डेनमार्क और नॉर्वे शामिल हैं । ये देश भूटानी शरणार्थियों के संकट को दूर करने की दिशा में काम कर रहे हैं । कोर ग्रुप की तरफ से सुश्री पॉवेल ने एक बयान जारी किया, जिसमें उन्होंने कहा कि हमें आशा है कि वर्ष 2008 में नेपाल से आए 30,000 से अधिक शरणार्थियों को दूसरी जगह बसाया जा सकेगा । हमें आशा है कि वर्ष 2009 के अंत तक 20,000 अतिरिक्त शरणार्थी, जिन्होंने दूसरी जगह बसना स्वीकार कर लिया है, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और दूसरी जगहों पर नया जीवन शुरू कर सकेंगे ।

ये शरणार्थी उन नेपालियों की संतानें हैं, जो 19वीं सदी में भूटान चले गए थे । नेपाली मूल के इन शरणार्थियों में से अधिकतर हिंदू थे और उन्होंने भूटान के बौद्ध ड्रक बहुसंख्यक समाज से बहुत हद तक अपनी भिन्न पहचान बनाए रखी । 1980 के दशक में बौद्धों के वर्चस्व वाली भूटानी सरकार ने नेपाली मूल के लोगों की नागरिकता छीन ली । इसके अलावा सरकार ने उन्हें बुनियादी अधिकारों से भी वंचित कर दिया । सरकार ने दसियों हजार नेपाली मूल के लोगों को देश से निकाल दिया । वर्ष 1991 से लेकर अब तक नेपाल 1 लाख से अधिक भूटानी शरणार्थियों को शरण दे चुका है । इनमें से काफी संख्या में ऐसे लोग हैं, जो भूटान में अपने घर लौटने की ही इच्छा संजोए हुए हैं । अमेरिकी राजदूत नैन्सी पॉवेल ने कहा कि कोर ग्रुप इस बात पर जोर देना चाहेगा कि फिर से बसाने की पेशकश के साथ  साथ भूटान की सरकार पर उन शरणार्थियों को वापस लेने का दबाव भी जारी रखा जाए । सुश्री पॉवेल ने कहा कि नेपाल के लोगों के साथ उन्हें जोड़ना भी एक बेहतर विकल्प हो सकता है ।  

जिन शरणार्थियों ने अमेरिका या अन्य देशों में बसना स्वीकार कर लिया है, उन्हें उन शरणार्थियों की हिंसा का शिकार होना पड़ा है, जो चाहते हैं कि तमाम शरणार्थी फिर से भूटान भेजे जाएं । सुश्री पॉवेल ने कहा कि हर शरणार्थी को अपना विकल्प चुनने का अधिकार है । लेकिन उन्हें धमकी देकर एवं डरा-धमका कर इसके लिए मजबूर नहीं किया जा सकता । हम जानते हैं कि शिविरों में बसे अनेकों शरणार्थी अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं । उन्होंने नेपाल सरकार से शिविरों में रहने वाले लोगों के खिलाफ हिंसा करने वालों के विरुद्ध जल्दी से जल्दी कार्यवाही करने की अपील  की ।

सुश्री पॉवेल ने कहा है कि देशों के कोर ग्रुप की अपने यहां बसाने की पेशकश, भूटानी शरणार्थियों की समस्या का स्थायी समाधान है ।