(संवाददाता, वी.ओ.ए न्यूज़)
चीनी सरकारी मीडिया ने कहा है कि चीनी शासन के खिलाफ तिब्बतियों द्वारा किये गए कई आंदोलनों के हिंसक होने के बाद 600 से ज्यादा लोगों ने समर्पण कर दिया है ।
चीन की सरकारी शिन्हुआ समाचार एजेंसी ने कहा है कि तिब्बत की राजधानी ल्हासा में 280 लोगों ने और दक्षिण-पश्चिम सिचुआन प्रांत में 381 तिब्बतियों ने पुलिस के सामने समर्पण कर दिया है ।
चीनी अधिकारी यह मांग कर रहे थे कि पुलिस के साथ हुई झड़पों, आंदोलनों और दंगों में भाग लेने वाले तिब्बती समर्पण कर दें ।
चीन सरकार ने कहा है कि दंगाइयों ने 19 नागरिकों और एक पुलिसकर्मी को मार दिया । उसने कहा है कि निकटवर्ती प्रांतों में फैले प्रदर्शनों और झड़पों में सैकड़ों लोग घायल हो गए ।
तिब्बत की निर्वासित सरकार ने कहा है कि झड़पों और पुलिस द्वारा किये गए दमन में 140 लोग मारे गए थे । बीजिंग ने स्वीकार किया है कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाई थीं पर कहा है कि यह आत्मरक्षा में किया गया था और केवल 4 लोग घायल हुए थे तथा किसी की मौत नहीं हुई ।
हालांकि बहुत से देशों ने चीन से संयम बरतने के लिए कहा है, लेकिन बीजिंग ने तिब्बत के निर्वासित धार्मिक नेता और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता दलाई लामा को हिंसा भड़काने के लिए दोषी ठहराया है ।
श्री किन गांग चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हैं । उन्होंने कहा कि दलाई लामा और उनके समर्थकों ने जान-बूझकर हिंसा की साजिश की, लोगों को भड़काया, योजना बनाई और हिंसा आयोजित की । उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य चीन को विभाजित करना, उसकी संप्रभुता को और क्षेत्रीय अखंडता तथा सामाजिक स्थिरता को नुकसान पहुंचाना और स्थानीय लोगों के जीवन और संपत्ति को खतरे में डालना था ।
हालांकि बीजिंग दलाई लामा को खलनायक की तरह पेश करने का प्रयास कर रहा है, लेकिन सरकार-समर्थक विद्वान तक स्वीकार करते हैं कि बौद्ध नेता का अब भी तिब्बतियों में बहुत सम्मान है ।
प्रोफेसर ड्रामडुल चीन-तिब्बत शोध केंद्र में धार्मिक अध्ययन संस्थान के निदेशक हैं । उनका कहना है कि तिब्बत में बौद्धों की धर्म में बहुत गहरी आस्था है और तिब्बती बौद्ध धर्म में जीवित बुद्ध के लिए उनकी बहुत गहरी भावनाएं हैं, परंतु उन्होंने कहा कि कुछ लोगों ने अपने हितों के लिए इन भावनाओं का दुरुपयोग किया है ।
तिब्बतियों ने 10 मार्च को, दलाई लामा द्वारा कठोर चीनी शासन के खिलाफ 1959 में किये गए असफल आंदोलन की वर्षगांठ पर ल्हासा में प्रदर्शन किये थे । आमतौर पर शांतिपूर्ण रहे प्रदर्शन 14 मार्च को दंगों में बदल गए थे और इमारतों को आग लगा दी गई थी तथा दुकानें लूटी गई थीं ।
यह स्पष्ट नहीं है कि ये शांतिपूर्ण प्रदर्शन कैसे हिंसक हो गए और मृतकों की किसी भी संख्या की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकी है ।
चीन सरकार ने आज तक विदेशी पत्रकारों को तिब्बत तथा उन अन्य इलाकों में जाने की इजाजत नहीं दी थी, जहां झड़पें और प्रदर्शन हुए थे ।
चीनी अधिकारी विदेशी पत्रकारों के एक गुट को तीन दिन के समाचार संकलन दौरे पर अपने साथ तिब्बत ले जा रहे हैं । श्री किन का कहना है कि वह हिंसा से पीड़ित हुए लोगों से इंटरव्यू करने तथा दंगाइयों द्वारा किये गए नुकसान को पत्रकारों को दिखाने की व्यवस्था करेंगे ताकि वे इस घटना के बारे में सच्चाई जान सकें ।