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तिब्बत- विभिन्न विचार

27/03/2008

(संवाददाता, वी.ओ.ए न्यूज़)

तिब्बत में पिछले दो हफ्तों में हुए दंगों के बारे में बहुत कम जानकारी मिली है और इसके कारणों तथा मृतकों की संख्या के बारे में अलग-अलग विचार सामने आए हैं । जूडिथ लाथम (जू ला) ने तिब्बत में प्रदर्शनों के बारे में चीन, भारत और अमेरिका में संवाददाताओं से बातचीत की ।

 

जू ला : तिब्बत की भारत स्थित निर्वासित सरकार ने कहा है कि हाल ही में तिब्बत में और उसके आसपास चीनी अधिकारियों और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़पों में 100 से ज्यादा लोग मारे गए हैं । बीजिंग ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा है कि यह संख्या काफी कम है । चीनी अधिकारियों ने दंगों की अंतर्राष्ट्रीय संवाददाता द्वारा दी गई खबरों की तीखी आलोचना करते हुए इसे पूर्वाग्रह से ग्रस्त बताया है । बीजिंग में वी.ओ.ए संवाददाता स्टीफेनी हो ने बताया कि चीनी मीडिया में तिब्बत की स्थिति को बहुत अलग ढंग से देखा जा रहा है ।

 

उन्होंने कहा कि चीनी मीडिया इसे तिब्बती दंगाइयों का काम बता रहा है, जिन्होंने खिड़कियों को तोड़ने और लूट-मार करने तथा चीनी लोगों को मारने का फैसला किया है । इसलिए चीनी जनता पश्चिमी मीडिया में आए समाचारों से बहुत नाराज है । वॉइस ऑफ अमेरिका के कार्यालय को ऐसे लोगों के बहुत सारे फोन मिल रहे हैं, जो चीन के बाहर मीडिया में आई खबरों की शिकायतें कर रहे हैं और उनका कहना है कि वह नहीं समझ पा रहे कि हर कोई इसे गलत क्यों समझ रहा है । समस्या यह है कि ल्हासा से बाहर आ रही जानकारी बहुत सतही है, इसलिए हमें केवल इन घटनाओं के बारे में चीनी अधिकारियों का संस्करण, अफवाहें और सेलफोन से ली गई तस्वीरें मिल रही हैं । हम नहीं जानते कि वास्तविक कहानी क्या है ।

 

जू ला : वास्तविक कहानी जानना मुश्किल है, क्योंकि चीन ने विदेशी संवाददाताओं के तिब्बत और आसपास के प्रांतों में, जहां आंदोलन फैला हुआ है, स्वतंत्र जानकारी लेने के लिए आजादी से जाने पर प्रतिबंध लगा रखा है । इसके अतिरिक्त, बीजिंग सरकार ने जनता को यह विश्वास दिलाने के लिए प्रचार अभियान शुरू कर दिया है कि तिब्बत के निर्वासित नेता दलाई लामा ने 14 मार्च को हिंसा को भड़काया था और चीन अलगाववादी, आतंकवादी गतिविधियों का शिकार है । परंतु स्टीफेनी हो का कहना है कि प्रदर्शनों के कई कारण हैं- धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक ।

 

उन्होंने कहा कि तिब्बत में तिब्बतियों के बीच इस बात को लेकर बहुत नाराजगी है कि वे पीछे छूट गए हैं । चीन सरकार ने तिब्बत में निर्माण करने के लिए बहुत सारा पैसा खर्च किया है, लेकिन इसका ज्यादातर लाभ हान चीनियों को हुआ है । इसलिए तिब्बती नाराज हैं । उन्हें लगता है कि उनके धर्म का पर्याप्त सम्मान नहीं किया जाता । तिब्बती बौद्ध धर्म में दलाई लामा सबसे पवित्र व्यक्ति हैं और चीन सरकार लगातार उनकी आलोचना करती रहती है ।

 

जू ला : बीजिंग के प्रचार के विपरीत दलाई लामा को एक उदारवादी की तरह देखा जाता है- ऐसे व्यक्ति, जो हिंसा का विरोध करते हैं और जिन्होंने वर्षों से चीनियों से मिलने का प्रयास किया है । वॉशिंगटन सहित अन्य पश्चिमी सरकारें चीनी अधिकारियों से दलाई लामा से मिलने और किसी नतीजे पर पहुंचने का अनुरोध कर रही हैं । परंतु बहुत से क्षेत्रीय पर्यवेक्षकों का कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने तिब्बती प्रदर्शनकारियों पर बीजिंग द्वारा की गई कठोर कार्रवाई को लेकर चीन पर पर्याप्त दबाव नहीं डाला है । नई दिल्ली स्थित समाचार पत्रिका, बिजनेस वर्ल्ड के भारतीय पत्रकार जहांगीर पोचा ने कहा कि अमेरिका और भारत जैसी विदेशी सरकारों के बीच मतभेद हैं ।

 

उन्होंने कहा कि पूरी तरह मानवीय आधार पर कहा जाए तो स्थिति बहुत कठिन है । अगर कम्युनिस्ट पार्टी के साथ कड़ा बर्ताव किया जाए तो 1.2 अरब लोगों के देश की स्थिरता को खतरा हो सकता है । इसके साथ ही स्वदेशी तिब्बती लोगों की चिंताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता ।

 

जू ला : इंटरनेशनल कैम्पेन फॉर तिब्बत के उपाध्यक्ष भूचुंग त्सेरिंग तिब्बत में पैदा हुए थे, भारत में बड़े हुए और अब वॉशिंगटन में रहते हैं । उनका कहना है कि वास्तव में तिब्बती लोगों को ल्हासा में हाल ही में आंदोलन छेड़ने के लिए मजबूर किया गया था ।

 

उन्होंने कहा कि चीन सरकार की नीतियां तिब्बती लोगों को मान्यता देने और उनकी अलग पहचान का सम्मान करने में तथा उनकी विशिष्ट विरासत को संरक्षित करने के लिए स्थान देने और प्रोत्साहन देने में असफल रही हैं । इसके नीचे ऐसे बहुत से कारण हैं, जिनसे तिब्बती लोगों को महसूस होता है कि उन्हें लगातार हाशिये में धकेला जा रहा है । मेरे विचार में हाल ही में जो चिंगारी भड़की, उसका कारण चीन सरकार द्वारा दलाई लामा की लगातार भर्त्सना करना है ।

 

जू ला : जहांगीर पोचा का कहना है कि वास्तव में दलाई लामा कई सालों से अपने मध्यस्थों के जरिये चीन सरकार से बातचीत कर रहे हैं । परंतु निर्वासित तिब्बती सरकार, जिसका मुख्यालय उत्तर भारत के धर्मशाला शहर में है, को यह भरोसा नहीं है कि बीजिंग अच्छी नीयत से बातचीत कर रहा है । इसके अतिरिक्त, वास्तविक समस्या तिब्बती स्वायत्तता के मुद्दे से कहीं बड़ी है ।

 

श्री पोचा ने कहा कि बीजिंग और तिब्बतियों के बीच प्रमुख मुद्दा तिब्बत की परिभाषा का है । चीनी तिब्बत को सिर्फ एक प्रांत मानते हैं, जिसे वे तिब्बती स्वायत्त क्षेत्र या टीएआर कहते हैं । तिब्बती टीएआर के प्रांत तथा अन्य चीनी प्रांतों जैसे कि किंगहाई, गानसू और सिचुआन के तिब्बती क्षेत्रों को तिब्बत मानते हैं और इसी वजह से बातचीत रुकी हुई है । इसे बहुत अच्छी तरह समझा नहीं गया है और लगता है कि किसी के पास इस मुद्दे का हल नहीं है ।

 

श्री भूचुंग त्सेरिंग का कहना है कि चीनी नेतृत्व और दलाई लामा के प्रतिनिधियों के बीच संपर्क 2002 में फिर से स्थापित किया गया था और तब से निजी बातचीत के 6 दौर हो चुके हैं तथा सभी असंतोषजनक रहे हैं । इसलिए तिब्बती शंकालु हैं । श्री भूचुंग त्सेरिंग ने कहा कि निर्वासित तिब्बती आंदोलन के कुछ लोग अब 2008 के ओलंपिक खेलों का बहिष्कार करने की मांग कर रहे हैं, जो इन गर्मियों में बीजिंग में होने वाले हैं ।

 

कुछ पश्चिमी आलोचकों का यह भी कहना है कि हो सकता है कि अगर पर्दे के पीछे बीजिंग पर दबाव डालने की कोशिश नाकाम हो जाती है तो उनकी सरकारों को ऐसी धमकी देनी पड़ सकती है या कम-से-कम ओलंपिक खेलों के उद्घाटन समारोह का बहिष्कार करना पड़ सकता है ।

 

फिलहाल तो राष्ट्रपति बुश ने कहा है कि वह उद्घाटन समारोह के लिए इन गर्मियों में बीजिंग जाने की योजना बना रहे हैं ।

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