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India's Prime Minister Manmohan Singh (r) with President Bush .
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भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमेरिका के साथ
परमाणु समझौता सम्पन्न करने की भरसक कोशिश कर रहे है, जिससे देश को अपने ऊर्जा
संयंत्रों के लिए परमाणु ईंधन और प्रौद्योगिकी खरीदने में मदद मिलेगी, हालांकि
उसने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं । श्री सिंह ने कहा है कि
हालांकि भारत में इस सौदे का कुछ राजनीतिक विरोध हो रहा है, लेकिन उन्हें आशा है
कि वह अगले हफ्ते जब जी-8 सम्मेलन में भाग लेने जापान जाएंगे तो अमेरिकी
राष्ट्रपति बुश को सकारात्मक संदेश दे सकेंगे । वी.ओ.ए संवाददाता रवि खन्ना
की रिपोर्ट-
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद में
अपने वामपंथी सहयोगियों से इस समझौते को आगे बढ़ाने देने के लिए सार्वजनिक अपील
जारी की । वह अगले हफ्ते जी-8 शिखर सम्मेलन में जाने से पहले अंतर्राष्ट्रीय
परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ समझौते को अंतिम रूप देना चाहते हैं ।
इस समझौते के अंतर्गत भारत के गैर-सैनिक परमाणु
प्रतिष्ठानों का अंतर्राष्ट्रीय निरीक्षण किया जा सकेगा ।
उन्होंने कहा कि इसके बाद वह इस समझौते को संसद में
पेश करेंगे और उसके बाद ही इसे अमेरिकी कांग्रेस को उसकी अंतिम मंजूरी के लिए भेजा
जाएगा ।
श्री मनमोहन सिंह ने कहा, "हमें अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ भारत के लिए विशेष (परमाणु)
सुरक्षित उपायों का समझौता करना होगा । इसके बाद हमें न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप
से कहना होगा कि वे परमाणु सामग्री के मामले में व्यापार करने के लिए भारत के
प्रति अपने मौजूदा प्रतिबंधों में ढील दें ।"
परंतु श्री प्रकाश करात जैसे वामपंथी सांसद समझौते
का विरोध कर रहे हैं ।
भारतीय वामपंथी नेता प्रकाश करात ने कहा, "अमेरिकी प्रशासन के साथ द्विपक्षीय समझौता करने से भारत अमेरिका के साथ सामरिक
गठबंधन बनाने के लिए बाध्य होगा, जिसके दीर्घकालिक परिणाम होंगे ।"
वामपंथियों का कहना है कि अगर यह समझौता किया गया तो
वे अविश्वास प्रस्ताव लाने पर सत्तारूढ़ गठबंधन का समर्थन नहीं करेंगे ।
नई दिल्ली से मिली खबरों में कहा गया है कि श्री
सिंह उनके बजाय विपक्षी दलों का समर्थन प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं ।
जॉन हॉपकिन्स विश्वविद्यालय में दक्षिण एशिया
विशेषज्ञ वॉल्टर एंडर्सन ने कहा कि वह श्री सिंह की व्यग्रता को समझते हैं ।
उन्होंने कहा कि अगले एक या दो हफ्तों में कुछ किया
जाना जरूरी है ताकि मौजूदा अमेरिकी कांग्रेस इस पर, अगली कांग्रेस की 20 जनवरी को
होने वाली बैठक से पहले, विचार कर सके । हो सकता है कि इस समझौते के प्रति अगली
कांग्रेस का रवैया मौजूदा कांग्रेस की तुलना में कम मित्रतापूर्ण हो ।
उन्होंने कहा कि अगर भारत में विरोधी इसमें विलंब
करते रहेंगे तो समय खत्म हो सकता है और कोई समझौता नहीं होगा । उन्होंने कहा कि नए
प्रशासन द्वारा इस समझौते को मंजूरी दिये जाने की संभावना कम है ।
श्री वॉल्टर एंडर्सन ने कहा कि क्या श्री बराक ओबामा
या श्री जॉन मैककेन का नया प्रशासन इतना उत्साही होगा ?
किसी ने भी उतनी दिलचस्पी नहीं दिखाई है, जितनी श्री जॉर्ज बुश ने दिखाई है ।
वास्तव में श्री ओबामा ने परमाणु अप्रसार में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई है ।
वॉशिंगटन में सीनेट की विदेशी मामलों की समिति के
अध्यक्ष जॉसेफ बिडेन ने सोमवार को कहा कि अगर भारत अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा
एजेंसी से मंजूरी हासिल कर लेता है तो वह इस समझौते को स्वीकृति दिलाने के लिए भरसक
प्रयास करेंगे ।
वुडरो विलसन सेंटर के दक्षिण एशिया विशेषज्ञ डेनिस
कक्स ने कहा कि अगर भारत यह समझौता नहीं कर सका तो महाशक्ति के तौर पर उसके भविष्य
के बारे में सवाल उठ सकते हैं ।
उन्होंने कहा कि इस पर भारत सरकार ने बातचीत की थी,
भारत सरकार को वह मिला, जो वह चाहती थी और अब ऐसा लगता है कि उसमें इसे आगे बढ़ाने
की दृढ़ता नहीं है । इससे भारत की छवि अच्छी नहीं होगी ।
श्री कक्स ने कहा कि भारत की तेजी से विकसित होती
अर्थव्यवस्था के कारण भारत को ऊर्जा की जरूरत है और यह समझौता उसे न केवल ऊर्जा,
बल्कि स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध कराएगा ।