अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस ने कहा है कि हमारी दुनिया के सामने खड़ी चुनौतियों में से एक है कमजोर और बुरी तरह से शासित देशों से निबटना । यह चुनौती एक अर्से से चली आ रही है और अभी भी मौजूद है । असफलता की कगार पर खड़े देश अराजकता और संघर्ष का माहौल बनाते हैं । इन देशों में हिंसा और दमन बढ़ सकते हैं । हथियारों के तस्कर और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काम करने वाले अपराधी स्वतंत्र घूम सकते हैं । असफल देश आतंकवादियों और उग्रवादियों को संरक्षण देने का काम भी करते हैं ।  |
US Secretary of State Condoleezza Rice
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सुश्री राइस ने कहा कि यह साफ है कि आने वाले समय में अमेरिका की विदेश नीति की एक खासियत यह होगी कि किसी देश की असफलता से उत्पन्न समस्या का प्रबंधन कैसे किया जाए । पिछले कई सालों से अमेरिका संघर्ष के खतरे का सामना कर रहे या उससे बाहर निकले हैती, लाइबेरिया, अफगानिस्तान और इराक जैसे देशों की मदद करता आ रहा है । एक अर्से से पुनर्निर्माण और स्थायित्व बहाल करने के
प्रयासों का मुख्य दायित्व
सेना ने अपने कंधों पर उठा रखा है, लेकिन अनुभव बताता है कि सरकार के नागरिक संगठन ही इस तरह की मुहिमों को सबसे अधिक बढ़िया ढंग से अंजाम दे सकते हैं ।
यही कारण है कि राष्ट्रपति बुश ने एक सिविलियन रेस्पॉन्स कोर नामक संस्था की पेशकश की है । इस संस्था के तीन हिस्से होंगे । पहला हिस्सा सक्रिय भाग होगा । इसमें ढाई सौ गैर-सैनिक विशेषज्ञ होंगे, जो संकट के मौके पर तत्काल उपस्थित हो सकते हैं । ये लोग विदेशी नेताओं और नागरिकों में धैर्य जगाने और उनके देशों के पुनर्निर्माण में मदद कर सकते हैं ।
इसके अलावा अमेरिका सिविलियन रेस्पॉन्स कोर के 2,000 लोगों को प्रशिक्षित करेगा, जिनका उपयोग जरूरत पड़ने की स्थिति में किया जाएगा । इसके लिए नियमित संघीय कर्मचारी हैं, जिनमें डॉक्टर, इंजीनियर, वकील और कृषि विशेषज्ञ शामिल हैं । ये अतिरिक्त प्रशिक्षण देने का काम करते हैं । कोई संकट पैदा होने की स्थिति में ये लोग उपलब्ध होंगे ।
अंत में राष्ट्रपति बुश ने सिविलियन रेस्पॉन्स कोर में रिजर्व में रखे जाने वाले 2,000 निजी विशेषज्ञों के तौर पर नागरिकों का एक समूह बनाने का अनुरोध किया है । ये लोग विदेशी नेताओं और नागरिकों की उनके राष्ट्रों की स्थिरता और
पुनर्निर्माण नें सहायता करेंगे ।
अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस ने कहा कि इस कोर का अंतिम लक्ष्य है संकट में फंसे देशों को जल्द-से-जल्द उबर कर अपना शासन स्वयं संभालने के लिए सक्षम होने और अमेरिका या अंतर्राष्ट्रीय सहायता के बिना उन्हें
अपने आपको सामान्य स्थिति में बनाए रखने और अपनी रक्षा स्वयं करने के योग्य
बनाना ।