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दक्षिण एशिया के पर्यावरण संरक्षणवादियों ने कीट-पतंगों के बढ़ते हुए अवैध
व्यापार पर चेतावनी दी है । नई दिल्ली से वी.ओ.ए. संवाददाता स्टीव हरमन अपनी
रिपोर्ट में लिखते हैं कि गांव के किसी बच्चे से कुछ ही सिक्कों में कुछ मूल्यवान कीट-पतंग खरीदे जा सकते हैं, जिन्हें
विदेशों में बेच कर बड़ा धन कमाया जा सकता है ।
एशिया में चीतों, शेरों और गेंडों का शिकार तो एक ऐसी समस्या है, जिसे सभी
जानते हैं । लेकिन अब पर्यावरणवादी छोटे जीव-जंतुओं को लेकर चिंतित हैं, जिन्हें
अपराधी लोग पकड़ रहे हैं ।
इस इलाके के अनेक कीट-पतंगों को प्लास्टिक के चाबी के गुच्छों, पेपरवेट और
ग्रीटिंग कार्ड में सजाने के लिए मारा जा रहा है । कुछ बीटल्स का सत एशिया और
लैटिन अमेरिका के कुछ देशों में पारंपरिक दवाइयां बनाने में इस्तेमाल किया जाता है
। कुछ कीट-पतंगों की दुर्लभ प्रजातियों की अंतर्राष्ट्रीय अमीर संग्रहकर्ता
हज़ारों डॉलर कीमत अदा कर सकते हैं ।
हालंकि इन कीट-पतंगों को अवैध रूप से पकड़ कर बेचने के कुछ ही आपराधिक मामले
दर्ज होते हैं, लेकिन वन्य जीवन के विशेषज्ञों का अनुमान है कि इसका कुल कारोबार
काफी बड़ा है । विश्लेषकों का कहना है कि तस्करों के पास हज़ारों किस्म के
कीट-पतंग हो सकते हैं ।
वन्य जीवन व्यापार पर निगाह रखने वाले एक नेटवर्क, टीआरएएफएफआईसी के भारतीय
संयोजक, खालिद पाशा का कहना है कि तितलियों और कीटों का अवैध कारोबार एक बड़ा
व्यापार बनता जा रहा है ।
हाल ही में चेक रिपब्लिक के दो शोधकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद यह समस्या
प्रकाश में आई है । इन वैज्ञानिकों का कहना है कि वे पश्चिम बंगाल के एक राष्ट्रीय
उद्यान में खड़े थे, जब उन्हें दुर्लभ प्रजाति की सैंकड़ों तितलियों, बीटल्स और
पतंगों के साथ पकड़ा गया ।
भारत के वन अधिकारियों का कहना है कि विदेशी शोध करने की आड़ में जैव चोरी के
धंधे में लगे हुए हैं ।
हाल के वर्षों में जापानी, रूसी और फ्रांसीसी नागरिकों को नेपाल, सिक्किम और
केरल से दुर्लभ प्रजाति के कीट-पतंगों लेते हुए पकड़ा गया है ।
इन कीट-पतंगों को बिना अनुमति के संग्रह करना गंभीर अपराध है और भारतीय कानून
के तहत जेल की सजा भी हो सकती है । उस पर विडंबना यह है कि गांववालों को बड़े
जीवों का शिकार न करने के बारे में तो पता है, लेकिन उन्हें यह मालूम नहीं है कि
कीट-पतंगों को पकड़ना भी गैर-कानूनी काम है, जो विदेशी तस्कर उनसे कराते हैं ।