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भारतीय प्रधान मंत्रीः कार्बन उत्सर्जन की कटौती में निर्धन देशों में आने वाला ख़र्च धनाड्य देश उठाएं
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08/11/2009
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 | | Indian PM Manmohan Singh (file photo) | प्रमुख मौसम परिवर्तन सम्मेलन के एक महीने पहले भारतीय प्रधान मंत्री ने औद्योगीकृत देशों से रियायतों की स्पष्टवादी मांग की है. इस बारे में पूरा विवरण नई दिल्ली स्थित हमारे संवाददाता स्टीव हरमन ने भेजा हैः
भारतीय प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने वचन दिया है कि अगले महीने कार्बन उत्सर्जन के बारे में सीमा तय करने के लिए होने वाले राष्ट्रसंघ के महत्वपूर्ण सम्मेलन के सकारात्मक परिणाम के लिए उनकी सरकार पूरा प्रयास करेगी. लेकिन श्री सिंह ने यह स्पष्ट कर दिया कि क्योंकि यह समस्या धनाड्य देशों ने खड़ी की है इसलिए इसका वित्तीय बोझ उन्हें ही उठाना होगा. श्री सिंह ने कहाः
“CO2 के ऐतिहासिक रूप से इकट्ठा होने के लिए हम ज़िम्मेदार नहीं हैं. यह प्रमुख रूप से विश्व के बड़े विकसित देशों के डेढ़ सौ वर्षों के औद्योगीकरण का परिणाम है.”
विश्व आर्थिक मंच के भारतीय शिखर सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए प्रधान मंत्री ने कहा कि पारंपरिक रूप से प्रदूषण फैलाने वाले बड़े देशों को, विकासशील देशों में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने के लिए उन्हें टैक्नोलोजी उपलब्ध करानी चाहिए. यूरोपीय संघ का अनुमान है कि सन 2020 तक इसके लिए प्रति वर्ष डेढ़ सौ अरब डौलर का ख़र्च आएगा.
छह दिसंबर को कोपनहेगन में शुरू होने वाले शिखर सम्मेलन में भारत की अवस्थिति यह होगी कि निर्धनतर देशों को कार्बन उत्सर्जन की क़ानूनी रूप से अधिकतम सीमा का पालन करने न करने की छूट दी जानी चाहिए.
अमरीका और अन्य विकसित देश चाहते हैं कि भारत कार्बन उत्सर्जन का अपना हिस्सा कम करे, जो इस समय लगभग चार प्रतिशत है. हाल के दिनों में श्री सिंह कहते रहे हैं कि उनकी सरकार अभी कटौती का लक्ष्य रखने को तैय्यार नहीं है लेकिन उन्होंने उसके लिए द्वार खुले रख छोड़े हैं.
अगले महीने के शिखर सम्मेलन में होने वाले किसी भी समझौते में भारत और चीन की प्रमुख भूमिका मानी जा रही है. लेकिन तेज़ी से विकसित होती अर्थ व्यवस्था वाले यह दोनों दक्षिण एशियाई देश इस तरह की अवस्थिति में नहीं बंधना चाहते जिससे उनकी अर्थव्यवस्था के विकास की गति धीमी पड़ जाए. उन्होंने बहु-राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन समझौता वार्ताओं में मिल कर काम करने के सार्वजनिक वक्तव्य दिए हैं.
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