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न्यूयॉर्क में तिब्बती गुटों, समर्थकों ने बीजिंग ओलंपिक का विरोध किया

11/03/2008

(संवाददाता, वी.ओ.ए न्यूज़)

चीनी शासन के खिलाफ तिब्बती आंदोलन की 49वीं वर्षगांठ के मौके पर न्यूयॉर्क शहर में तिब्बती शरणार्थियों, कार्यकर्ता गुटों और अन्य समर्थकों ने तिब्बत की स्वतंत्रता की मांग की और बीजिंग में होने वाले ओलंपिक खेलों का विरोध किया ।

 

तिब्बती और अमेरिकी झंडे लहराते हुए सैकड़ों प्रदर्शनकारी न्यूयॉर्क में अमेरिकी फेडरल कोर्ट हाउस से राष्ट्र संघ के भवन तक गए । इसी समय सैकड़ों अन्य प्रदर्शनकारियों ने शहर में चीनी वाणिज्य दूतावास के बाहर प्रदर्शन किया ।

 

तिब्बती समर्थकों ने कहा कि ये प्रदर्शन चीन के मानवाधिकार हनन के रिकॉर्ड की तरफ ध्यान आकर्षित करने और देशों तथा उद्योग समूहों से यह अनुरोध करने के विश्वव्यापी प्रयास का हिस्सा हैं कि यदि चीन तिब्बत की स्थिति में सुधार नहीं करता तो वे बीजिंग में होने वाले ओलंपिक खेलों का बहिष्कार करें ।

 

न्यूयॉर्क प्रदर्शन के आयोजकों में से एक, तिब्बती युवा कांग्रेस के स्थानीय दल के नेता त्सेरिंग पालदिन हैं । उन्होंने कहा कि चीन ओलंपिक खेलों को राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल कर रहा है और उसने अभी तक अपने मानवाधिकार रिकॉर्ड में सुधार नहीं किया है ।

 

"चीनियों ने वायदा किया था कि वे चीन और तिब्बत में मानवाधिकारों की स्थिति में सुधार करेंगे, लेकिन सच यह है कि उन्होंने विशेषकर तिब्बत में दमन बढ़ा दिया है ।"

 

श्री पाल्दिन ने कहा कि उन्हें आशा है कि न्यूयॉर्क और दुनिया भर में अन्य स्थानों पर हुए प्रदर्शनों से लोगों को स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर कार्रवाई करने का प्रोत्साहन मिलेगा । ग्रीस में तिब्बत की स्वतंत्रता के समर्थन में मशाल जलाने का समारोह किया गया और उत्तरी भारत में स्वतंत्रता-समर्थक निर्वासित तिब्बतियों ने एक महीने लंबा मार्च शुरू किया और उन्हें आशा है कि वे चीनी सीमा पार करके तिब्बत जा सकेंगे ।

 

प्रदर्शनों के लिए न्यूयॉर्क आई एक युवती ने कहा कि बीजिंग में होने वाले ओलंपिक खेलों को वह चीन की नीतियों के खिलाफ अपना विरोध प्रकट करने का अवसर मानती हैं । सुश्री पेमा योको ब्रिटेन में स्टूडेंट्स फॉर ए फ्री तिब्बत की राष्ट्रीय समन्वयक हैं । इस संगठन ने भी यह प्रदर्शन आयोजित करने में मदद की थी ।

 

सुश्री योको ने कहा कि जब तक तिब्बत का दमन किया जा रहा है और उस पर अवैध कब्जा है, तब तक चीन को विश्व मंच पर अपने आपको महिमा-मंडित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए ।

 

चीनी सैनिकों ने 1951 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया था और उसके आध्यात्मिक नेता दलाई लामा उस दशक के अंत में भाग कर भारत चले गए थे, तब से दुनिया भर में तिब्बती चीन के कब्जे का विरोध कर रहे हैं ।

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