उत्तर प्रदेश के सलाहकार बोर्ड ने वरुण पर रासुका लगाने को अवैध करार दिया है. हमने इस मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश त्रिवेदी से भी बात की इस मामले के कानूनी पहलू क्या हैं...और आगे क्या हो सकता है ?
श्री त्रिवेदी ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अनुसार हिरासत में लिये गये किसी भी व्यक्ति के मामले को परामर्श के लिये कानून में बताये गये तरीके से गठित सलाहकार बोर्ड को भेजना आवश्यक है...और संबधित राज्य सरकार द्वारा गठित बोर्ड को तीन सप्ताह के भीतर इस पर फैसला लेना होता है...उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर बोर्ड आगे की कार्यवाही का निर्णय लेता है...
श्री त्रिवेदी ने बताया कि यदि बोर्ड ये संस्तुति करता है कि इस पर रासुका लगाने के पर्याप्त साक्ष्य हैं...तो राज्य सरकार अपने विवेक के आधार पर रासुका लगाने या नहीं लगाने दोनो फैसले ले सकती है...लेकिन यदि बोर्ड ये फैसला लेता है कि हिरासत में लिये गये व्यक्ति पर रासुका लगाने के पर्याप्त आधार नहीं है...तो राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (1980) के भाग 12 की उप-धारा (2) के अनुसार ये फैसला राज्य सरकार के लिये बाध्यकारी होता है...और उसे तुरंत हिरासत में लिये गये व्यक्ति को रिहा करना होता है...उन्होंने आगे कहा कि रासुका कानून में बोर्ड के निर्णय को चुनौती देने का कोई प्रावधान नहीं है...यद्यपि श्री त्रिवेदी ने कहा कि चूंकि मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है...और सर्वोच्च न्यायालय को अपने अधीन आने वाले सभी अधीनस्थ न्यायालयों, ट्रिब्यूनलो के किसी भी फैसले पर पुनर्विचार का अधिकार है जिसे चुनौती नहीं दी जा सकती है....और यदि राज्य सरकार बोर्ड के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में ले जाना चाहती है तो ये सर्वोच्च न्यायालय के विवेक पर निर्भर करता है कि इस मामले में आगे क्या करना है...
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