आंध्र प्रदेश के एक सरकारी अस्पताल में इलाज के दौरान लापरवाही की वजह से जिंदगी भर के लिये अशक्त हो गये सॉफ्टवेयर इंजीनियर को 1 करोड़ रुपये का हर्जाना देने का आदेश सर्वोच्च न्यायालय ने दिया है.
इलाज में लापरवाही के लिये देश में पहली बार इतना बड़ा मुआवजा देने का आदेश दिया गया है. 1999 में राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने इस मामले में साढ़े पंद्रह लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था.
1990 में प्रशान्त धनका वक्ष नलिका में एक ट्यूमर का इलाज कराने के लिये एक सरकारी अस्पताल निज़ाम मेडिकल इन्स्टीट्यूट ऑफ हैदराबाद में भर्ती हुये थे...लेकिन डॉक्टरों ने उनकी शल्य चिकित्सा में लापरवाही बरती जिससे वो पक्षाघात के शिकार हो गये और उनके दोनों पैरों में लकवा मार गया. उस समय प्रशान्त धनका की आयु मात्र 20 वर्ष थी...और वो जिंदगी भर के लिये अशक्त हो गये.
इस लकवे की वजह से वो अपनी दिनचर्या के छोटे मोटे काम करने लायक भी नहीं रहे...उन्हें हमेशा एक सहायक की जरूरत होती है...इस लकवे की वजह से उनका विवाह भी नहीं हो सकता है.
न्यायाधीश बीएन अग्रवाल, जीएस सिंघवी और एचएस बेदी की पीठ ने सारे दस्तावेजों का अध्ययन करने के बाद कहा "उनका इलाज करने वाले डॉक्टरों ने ऑपरेशन में गंभीर लापरवाही की है...जिसकी वजह से पक्षाघात हुआ."
मुआवजा तय करते समय न्यायालय ने उनकी भावी आय, और लकवे की वजह से विवाह की संभावना समाप्त होने और भविष्य में उनके इलाज और सहायक रखने के खर्च के साथ उन्हें और उनके परिवार को हुई मानसिक वेदना को भी ध्यान में रखा. अदालत ने 1999 में उपभोक्ता आयोग का निर्णय आने के बाद से अब तक हुई देरी के लिये पूरी मुआवजा राशि पर 6% सालाना की दर ब्याज देने का भी आदेश दिया है.
प्रशान्त धनका ने बेहद कुशलता से अपना मुकदमा खुद लड़ा...जिसकी तारीफ करते हुये न्यायालय ने कहा "पीड़ित ने बेहद गरिमा से अपना पक्ष रखा और जिन डॉक्टरों की लापरवाही से उसका जीवन नष्ट हो गया उनके लिये भी कभी असंयत भाषा का इस्तेमाल नहीं किया.