एक ऐतिहासिक निर्णय में जिसके देश में दूरगामी परिणाम दिखाई देंगे...दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि दो समलैंगिक वयस्कों के बीच आपसी सहमति से शारीरिक संबंध अपराध की श्रेणी में नहीं आते हैं.
न्यायालय ने कहा कि दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 377 के अन्तर्गत आपराधिक करार देना मूल अधिकारों का उल्लंघन है.
न्यायालय ने कहा, "हम आईपीसी की धारा 377 को उस हद तक संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 15 के तहत दिये मूल अधिकारों का उल्लंघन करार देते हैं जिस हद तक ये निजी स्थान में वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों को आपराधिक ठहराती है."
न्यायाधीश अजीत प्रकाश शाह और न्यायाधीश एस मुरलीधर ने कहा कि यदि आईपीसी की धारा 377 में बदलाव नहीं किया जाता तो ये संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगा जिसके तहत सभी नागरिकों को जीवन का समान अधिकार और कानून के समक्ष बराबरी का दर्जा प्राप्त है.
न्यायालय ने कहा कि किसी भी तरह का भेदभाव समानता के अधिकार का ठीक उलटा है.
यद्यपि न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बिना सहमति के या फिर अवयस्कों के साथ इस तरह के संबंध आईपीसी की धारा 377 के तहत आपराधिक माने जायेंगे.
न्यायालय ने 105 पन्नों के अपने निर्णय में आगे कहा है कि ये निर्णय तब तक मान्य रहेगा जब तक संसद कानून में बदलाव नहीं करती है.