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सरकार ने वाम पंथी उग्रवादियों के ख़तरे को अधिक महत्व नहीं दियाः भारतीय अधिकारी
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15/07/2009
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 | | Paramilitary soldiers patrol at Lalgarh in west Midnapore 175 kilometers west from Calcutta, India | नई दिल्ली से अंजना पसरीचा की रिपोर्ट है कि पिछले महीने सुरक्षा सैनिकों को निशाना बनाने वाले घातक हमलों के लिए छापामारों को ज़िम्मेदार माना गया था.
भारत के गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने बुधवार को संसद में कहा कि सरकार, माओवादी विद्रोहियों की ओर से बढ़ते हुए ख़तरे का सही अंदाज़ा नहीं लगा सकी. उन्होंने कहाः
“मेरे विचार में हमने चुनौती को कम करके आंका. इस दौरान वामपंथी अतिवादियों ने अपने प्रभुत्व का दायरा बढ़ा लिया और अपने आपको मोर्चाबन्द कर लिया. अब वह राष्ट्र के लिए बहुत बड़ा ख़तरा बन गए हैं.”
गृह मंत्री का यह वक्तव्य, संदिग्ध माओवादी उग्रवादियों द्वारा पूर्वी छत्तीसगढ़ राज्य में 30 से अधिक पुलिस कर्मियों की हत्या के कई दिनों बाद जारी किया गया है. पुलिस ने कहा कि पहले तो विद्रोहियों ने एक ग़श्ती सुरक्षाकर्मी को निशाना बनाया, और अन्य सुरक्षाकर्मियों के वहां पहुंचने का इंतज़ार करते रहे. उनके वहां पहुंचते ही उन्होंने भारी हमला कर दिया.
छत्तीसगढ़ में यह हमला ऐसे समय में किया गया था जब सुरक्षा सैनिक पश्चिम बंगाल में ग्रामवासियों के उस दल पर नियंत्रण करने का प्रयास कर रहे थे, जिन्हें छापामारों ने बंधक बना लिया था.
गृह मंत्री चिदंबरम ने कहा कि सरकार विद्रोहियों द्वारा देश की सुरक्षा को दी गई चुनौती को “स्वीकार करने की तैय्यारी” कर रही है. उन्होंने कहा सरकार अगले महीने उन राज्यों की एक बैठक बुलाएगी जहां विद्रोही सक्रिय हैं. श्री चिदंबर ने विधायकों से आग्रह किया कि वह विद्रोहियों के ख़तरे की अनदेखी न करें.
“योजनाएं बनाई जा रही हैं लेकिन उनका विवरण जारी नहीं किया जा सकता. लेकिन संसद के सभी सदनों को समझना चाहिए कि हमें क़ानून के प्रशासन वाला लोकतांत्रिक गणराज्य बने रहना है, हमें वामपंथी अतिवाद की चुनौती का सामना संगठित होकर करना है.”
माओवादी विद्रोही, जिनकी अनुमानित संख्या दस से लेकर बीस हज़ार तक है, उन्होंने पूर्वी भारत के दूर दराज़ के क्षेत्रों में अपने अड्डे बना रखे हैं. इन क्षेत्रों में अभी भी ग़रीबी है, देश में हाल में हुए आर्थिक विकास की उपलब्धियां अभी उन क्षेत्रों में नहीं पहुंच सकी हैं.
वामपंथी उग्रवादियों के बढ़ते हुए प्रभुत्व के लिए, दूर दराज़ के क्षेत्रों की प्रशासन व्यवस्था में कमी को भी ज़िम्मेदार ठहराया जाता है. विश्लेषकों का कहना है कि विद्रोही, लोगों को डरा धमका कर अक्सर ऐसे क्षेत्रों में प्रभुत्व स्थापित कर लेते हैं जहां कोई प्रशासन नहीं है.
सुरक्षा विश्लेषक एक लंबे समय से छापामारों के विरुद्ध एक संगठित कार्यवाही करने, और उन्हें क़ाबू में करने के लिए तैनात सुरक्षा सैनिकों के प्रशिक्षण तथा सूचना के आदान प्रदान की बेहतर सुविधाएं प्रदान करने पर ज़ोर देते रहे हैं.
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