|
भारत द्वारा किए गए व्यापार समझौतों से क्षेत्र के आर्थिक एकीकरण में योगदान
|
19/08/2009
|
|
 | | S. Korean Trade Minister Kim Jong-hoon (r) shakes hands with India's Minister of Commerce and Industry Anand Sharma during a signing ceremony at the Foreign Ministry in Seoul, S. Korea, 07 Aug 2009 | नई दिल्ली से अंजना पसरीचा बताती हैं कि इन समझौतों से यह संकेत भी मिलते हैं कि भारत पूर्व एशिया से और अधिक पूंजीनिवेश को आकर्षित करने के लिए उत्सुक है.
इस महीने संपन्न दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन यानी आसियान के साथ किए गए समझौते को तैयार करने के लिए छह वर्षों तक सघन समझौता वार्ताएं की गईं.
दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन के दस देशों (इन्डोनेशिया, मलेशिया, सिंगापुर, वियतनाम, फ़िलीपीन्स, म्यानमार, ब्रूनेई, कंबोडिया, थाईलैंड और लाओस) के साथ समझौता संपन्न करने के पहले भारत ने दक्षिण कोरिया के साथ, आने वाले वर्षों में व्यापार शुल्क समाप्त किए जाने या उसे कम किए जाने के बारे में एक अन्य समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.
अर्थ शास्त्रियों का कहना है कि इन समझौतों से होने वाले लाभों के लिए की गई प्रतीक्षा फलीभूत होने का समय आ गया है, क्योंकि अब भारत की पहुंच 60 करोड़ से अधिक की आबादी वाले आर्थिक रूप से गतिशील क्षेत्र तक हो गई है. बदले में भारत ने दक्षिण पूर्व एशियाई देशों को एक अरब से अधिक लोगों की मंडी दी है.
नई दिल्ली स्थित अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों की भारतीय अनुसंधान परिषद के प्रमुख राजीव कुमार ध्यान दिलाते हैं कि पिछले चार वर्षों में भारत के निर्यातों में एशिया का हिस्सा काफ़ी बढ़ गया है. उन्होंने कहा स्वतंत्र व्यापार संगठनों ने एक ऐसे महत्वपूर्ण समय में हस्ताक्षर किए हैं जब विश्व के आर्थिक साझीदार बदल रहे हैं. उन्होंने कहाः
“हम जानते हैं कि वैश्विक आर्थिक गुरुत्वाकर्षण बदल कर धीरे धीरे लेकिन स्थिरता से प्रशांत महासागर के देशों और एशियाई देशों की ओर जा रहा है और उनके साथ जुड़ना भारत के लिए अच्छा होगा. और यह दो स्वतंत्र संगठन, भारत द्वारा एशियाई मंडियों की खोज और उनका बेहतर इस्तेमाल करने में सहायक सिद्ध होंगे. और एशिया के आर्थिक समुदाय में शामिल होने और उसे शक्तिशाली बनाने में भारत की रुचि उसके हित में होगी जो इस समय प्रारंभिक चरण में है.”
आशा है कि आगामी वर्षों में भारत और आसियान देशों के बीच व्यापार में 20 प्रतिशत की वृद्धि होगी जो पिछले वर्ष 47 अरब डौलर का था.
समझौते के अनुसार, कपड़ों, बिजली से चलने वाले उपकरणों, रसायनों और मशीनों का व्यापार कर कम कर दिया जाएगा और अंततः उसे समाप्त कर दिया जाएगा. लेकिन आयात, जिनका भारत के महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्र पर असर पड़ सकता है, जैसे रबर, इस छूट में शामिल नहीं हैं.
भारत को आशा है कि इस समझौते से उसकी दवाइयों, रसायन और कार निर्माण क्षेत्र के निर्यातों में वृद्धि होगी.
एस.के. मोहन्ती नई दिल्ली के थिंक टैंक, विकासशील देशों के लिए अनुसंधान और सूचना प्रणाली में वरिष्ट फ़ेलो हैं. उन्होंने कहा कि भारत की तेज़ी से आगे बढ़ रही अर्थ व्यवस्था को उसकी वृहत घरेलू मंडी से संवेग मिलता रहा है. लेकिन उन्होंने कहा कि निर्यात बढ़ने से उसके विकास में भी वृद्धि होगी. श्री मोहन्ती ने कहाः
“भारत में आर्थिक विकास का बहुत ऊंचा स्तर प्राप्त करने के लिए निर्यात बहुत ही महत्वपूर्ण होता जा रहा है, इसलिए निर्यात के क्षेत्र को उच्च प्राथमिकता दी जा रही है. भारत इस बात पर काफ़ी ज़ोर दे रहा है कि शेष अर्थ व्यवस्था की तुलना में उसके बाहरी क्षेत्र का विकास अधिक हो.”
भारत के नीति निर्माताओं को आशा है कि समझौते के लाभ व्यापार के लाभ से आगे बढ़ जाएंगे, और वह पूर्व एशियाई पूंजीनिवेशकों को आकर्षित कर सकेगा.
लेकिन अर्थ शास्त्री ध्यान दिलाते हैं कि भारत को चीन के साथ प्रतिस्पर्धा करनी होगी जिसके उत्पाद दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में भरे पड़े हैं. बढ़ते हुए व्यापार का लाभ उठाने के लिए भारत और पूर्व एशिया को परिवहन और सूचना संचार की बेहतर प्रणालियां स्थापित करनी होंगी.
|